Monday, February 8, 2010

संगदिल दिल्ली में दिल्लगी

चित्तरकार कई दिन से सड़कों से नदारद थे। गली, मोहल्ले और पार्कों के कोने उनके प्रेम में भीगने को तरस गए थे। सड़कों पर उनकी चप्पलों की रगड़ सुनाई नहीं दी तो चिंता हुई। जा पहुंचा ठौर पर। ज़नाब छाती पर ठुड्डी रखे गदही मुद्रा में सोच रहे थे। होठों पर पान के निशान उसी तरह बाकी थे जैसे युद्ध से लौटे किसी शूरवीर का सूखा खून। मैं हैरत में पड़ गया कि आख़िर कब से मोंटेक सिंह अहलूवालिया बन गए। योजना आयोग सी गंभीर मुद्रा में क्या विचार कर रहे हैं।

मैंने गला खंखारकर अपनी हाज़िरी लगाई। बेमन से बोले बैठो पत्तरकार। मैं बोला इतनी बेरुखाई से कहोगे तो क्या करुंगा बैठकर। बैठना हो तो बैठो, वरना अपना रस्ता नापो। आजकल ज़माना बेरुखाई का है। पाकिस्तान को देखो किस बेरुखाई से हमारे अमन के फाख्ते को फिदायीन बनाकर वापस करता है। हम भी ज़माने के साथ ढल रहे हैं। अब सबसे बेरुखाई से ही पेश आया करेंगे। एक खैनी दफ्तर दाख़िल करते हुए लाल ज़ुबान से शेर झाड़ा कि, क्या तेरी औक़ात है इस दुनिया में, रात के बाद भी एक रात है इस दुनिया में, शाख़ से तोड़े गए फूल ने हंसकर ये कहा, अच्छा होना भी बुरी बात है इस दुनिया में। इसलिए अच्छाई का वारफेर जूती से करने का मन बना लिया है।

मैं बोला आज क्या शासन व्यवस्था, लोकशाही, तंत्र, लालफीताशाही, बाज़ार की ऐन तेन करने का इरादा नहीं है? क्या बात है आज बड़े शायराना हुए जाते हो? आज क्या साम्यवाद की पीपड़ी बजाकर पूंजीवाद के खिलाफ बिगुल नहीं फूंकना? बोले सुनो जी, इतने सवाल एक साथ मत दागो नहीं तो तुम्हारे फेफड़े फट जाएंगे। हमारे शायराना होने पर तुम्हें क्यों चूने लग रहे हैं। अब बारी मेरे मुंह बनाने की थी, किसी तरह खुद को संभाल लिया और बोला कि कुछ माज़रा तो बताओ।

बोले कि हमने तमाम सुख भोगे, खूब घूमे फिरे मौज की शाद रहे। दिल्ली के तमाम रंग देखे। बाजार, मेले, ठेले, मूड्स ऑफ नाइट से लेकर मूड्स ऑफ डॉन (DAWN) तक। भारंगम देखा, थियेटर देखा, कॉफी हाउसों में बहस की, दोपहर को सेंट्रल पार्क में धूप सेंकी, शाम को रायसीना हिल्स की हवा खाई, इंडिया गेट, विज्ञान भवन पर चप्पल घिसे, फाक़े किए और गंड़ऊ ग़दर वाले सेमिनारों में पेट भरने की ख़ातिर चिल्लो च्याओं भी सुनी। स्साला एक रंग देखना बाकी था सो वो भी देख लिया। ज़नाब मैं ताड़ गया आप किस रंग की बात कर रहे हैं। चेहरा कंदमूल सा लटका है और ज़ुबान से गालियों समेत शायरी झड़ रही है, माने इश्क़ में हैं ज़नाब। हूं, हां मैं इश्क़ में हूं। चित्तरकार ने जवाब दिया।

मैं बोला ग़ज़ब कर दिया गुरू। संगदिल दिल्ली में हसीना से दिल्लगी कर बैठे, बड़ा जोख़िम लिया। बोले पत्तरकार चूतियापा मत बिखेरो। हम क्या तुम्हें GAY लगते हैं कि मर्दाना से दिल्लगी करके किसी सुलभ शौचालय या मेट्रो स्टेशन की आड़ ले रहे होते। हमने इश्क़ किया है। तमाम बेहतरीन एहसासों के साथ। संवेदनशील मामला है। हल्के में ट्रीट मत करो, नहीं तो बांस खोंस देंगे। एक तो पहले ही बेरुखी के मारे हैं अब तुमसे तो इतनी बेरुखी की उम्मीद नहीं थी। इतना कहकर रो पड़े। आंसू झड़े तो झड़ते ही चले गए।

जिसने त्रिकाल को ठोकर पर रखकर कसाले की ज़िंदगी जी हो उसे रोते देखकर लगा कि आख़िर ये भी इंसान है। या फिर इश्क़ और दिल दोनों ही कमीने होते हैं। जय हो बॉलीवुड। तुम सही कहते हो। समाज साला गाली समझे तो समझे और ग़ालिब शायरी का पलीता देखकर रोए तो रोए, लेकिन हमें तो तुम्हारी बात जंच गई। उधर चित्तरकार ने लीक होती नाक का माल मत्ता रुमाल से साफ करके बिस्तर पर पटक दिया। सुबकियां कम होती देख मैंने राष्ट्रीय चरित्र के मुताबिक मुफ्त की सलाह दागी। तो ज़नाब इज़हार कर दीजिए, क्यों हसरतें आंसुओं में ढालकर निकाल रहे हो।

बोले, कर दिया और लात भी खा ली। मेरी हंसी छूट गई। क्या कह रहे हो। तुम्हें किसी ने लात मार दी और तुम सहन कर गए। बोले रोग-ए-इश्क़, दिल का रोग़न निचोड़ लेता है। हमने किसी की खातिर अरमानों की बस्ती सजाई और वो इस बस्ती के छान छप्पर में माचिस खींच कर चली गई। किसी की खातिर आन ताक पर रखी और लात मारकर चली गई। कभी तुम्हें इश्क़ होगा तो जानोगे दर्द। मैं बोला चित्तरकार तुम्हारी ग़लती से मैंने सीख लिया कि क्या करना है और क्या नहीं। अब चित्तरकार को सहारे की ज़रूरत थी और एक ऐसा समीक्षक और आलोचक मुझसे इस प्रेम राग की समीक्षा करवाने की सोच रहा था जो हर बात का खरा निंदक, आलोचक और समीक्षक है। उसे इश्क़ और इसकी नाकामयाबी का सिरा नहीं सूझ रहा था। उसे लग रहा था कि सारे सपने चकनाचूर हो गए। सांस खींचकर सीना फुलाया और पिचकाया, फिर बोले कि जानता हूं तुम्हें मसाला दे दिया, ब्लॉग पर सियार की तरह हुआं हुआं करोगे। मैं बस मुस्कुरा भर दिया। केस हिस्ट्री सुनाकर मेरे दिमाग पर बड़े ही सीरियस मोड में सवाल चिपका दिया। बताओ, क्या है ये, और मैं क्या करूं?

मैं खुश हो गया पहली बार चित्तरकार ने पोडियम मुझे दिया था वरना मेरी बोलती बंद ही रखता था कंब्ख्त। हालांकि मुझे इश्क़-मुश्क़ का कोई खा़स तज़ुर्बा नहीं है और न ही मैंने इस विषय का सांगोपांग अध्ययन किया है लेकिन बोलने का मौका मैं नहीं छोड़ना चाहता था। चित्तरकार के हालात ट्रेज़डी किंग जैसे लग रहे थे। लग रहा था कि दिलीप कुमार ऐ भाई-ऐ भाई कहकर मदद मांग रहा है।

मैं बोला चित्तरकार तुम्हारी बातें तो लुभावनी हैं, लेकिन मेरे जैसों के लिए। लड़कियां बुद्धिजीवियों से दूरी बनाकर रखती हैं। उन्हें इंटेलेक्चुएलिटी नहीं राग लफंगा गाने वाले पसंद हैं। तुम साले हमेशा बौद्धिक पेचिश करके बदबू फैलाते हो। कोई क्यों आएगी तुम्हारे साथ, और तुम ही कहते हो चाणक्य का नाम लेकर कि सौंदर्य और मूर्खता प्रायः साथ चलते हैं। फिर कैसे भूल गए। यार सुनो, मैं बोला चुप रहो बे, मुझे बोलने दो। तुम्हारा क्या भविष्य है? साले सड़कों पर चप्पल खटकाते फिरते हो। क्या भरोसा आने वाला कल आज से बदतर हो। कोई क्यों दांव खेले तुम्हारे साथ। मोटा पर्स नहीं है, क्रेडिट कार्ड्स नहीं है, फटफटिया नहीं है। प्लास्टिक मनी के ज़माने में जेबों में चिल्लर छनछनाते फिरते हो। रही बात आन की तो आन की कोई कीमत नहीं, शान के दाम हैं। हुस्न शान पर मरता है। और कई शान वाले उसके दरवाज़े पर नाक रगड़ते हैं। जब मुफ्त में सोना मिले तो कोई रांगे पर क्यों अटके !

कभी डूड या हंक बने हो उसके सामने। इस बार बिफर पड़े चित्तरकार बोले साले हम क्या मोटरसाइकिल लगते हैं। मैं बोला हंक का एक और मतलब होता है मसलमैन। बोले हम क्यों जिम जाएं, लोहे से लड़ाई लड़ें। कीमती पसीना हमारा बहे और आमदनी हरामी जिम वाले की हो। मैं बोला जायज़ है। मत जाओ। फिर इश्क़-मुश्क मत फरमाओ। दिल्ली में दिमाग से इश्क़ करती हैं बालाएं, दिल से नहीं। तुम्हारे जैसे एस्थेटिक, देहाती और फटीचर प्यार को जूतियाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़तीं। इन्होंने अरमानों के जंग में लिपटे प्यार को हल्का फुल्का बनाकर उसमें एडजस्ट होने और उसका मज़ा लेने के लिए इस पर फ्रेंडशिप का पॉलिश चढ़ा दिया है। देखा कैसा चमक रहा है। बस और मेट्रो चकलाघर बन चले हैं। हर कोने में चुम्मा-चाटी हो रही है। तुम साले शादी का वज़न लाद रहे हो किसी पर। क्यों कोई सहन करेगी। अरमानों और अहसासों से हेविली लोडेड प्यार दिल्ली में फेल है भाई जी। अहसासों को दफ़न करो और उसे दिल दिमाग से दफा। पुस्तक मेला गया था तुम्हारे लिए सात सात माशूकाएं खरीदी हैं। लो थामों इन्हें उंगलियों के बीच और गड़ा दो इनके हुस्न पर निगाहें।

बोले पढ़ने का मन नहीं है यार। मैं भी ज़रा शायराना हो गया एक शेर झाड़ा कि, ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे आपको तीनों बलाओं से, तबीबों से वक़ीलों से हसीनों की निगाहों से। कहकर उठा तो बोले ठहरो मैं भी चलता हूं। बाहर पान की दुकान से एक पान गाल में दबाकर दीवार पर धार मारने चल दिए। मुझे लगा कि इन जैसों की वज़ह से ही आज भी रागदरबारी प्रासंगिक और कालजयी रचना है। असली आधुनिक और खांटी भारतीय का मिश्रण हैं, कहीं भी पान की दुकान और पेशाब करने की जगह ढूंढ ही लेते हैं। फिर तसल्ली से सोचा तो पता लगा कि वक़्त का हकीम बड़ा कारसाज़ है हर ज़ख़्म पर मरहम लगा देता है। ये भी उबर जाएगा।

Sunday, January 24, 2010

‘एलीट रद्दी’ की दुर्दशा

एक दौर था जब हम सुबह-सुबह अपने चेहरे के सामने अखबार यूं खोलते थे जैसे कोई हसीना आईना देखती हो। अखबार के पन्ने खड़खड़ाते हुए हमें अपने जागरुक होने का गुमान होता था। सारी दुनिया का जानकारीनुमा टॉनिक हम अल-सुबह गटककर बहसों के लिए पान की दुकानों के अखाड़ों में उतर जाते थे। ग्लोब की राजनीति की छिछालेदर, सब्ज़ी मंडी और लोकल बाज़ार पर हाय-तौबा मचाने के लिए हम अब भी इन अखाड़ों के स्थायी और अस्थायी बहसवीरों के बीच उतरते हैं, लेकिन ज़ुबान अब कैंची सी नहीं चलती। महंगाई पर बहस करते-करते कब हम पर महंगाई हावी हो गई पता ही नहीं चला। हमें पान और सिगरेट के सालाना स्थायी रेट से महंगाई का पता ही नहीं चला। महंगाई का अहसास तब हुआ जब अख़बार वाला हमारे हाथ में बिल थमा गया। हमारी जेब काटकर ले गया। हमने भी तिलमिलाकर फैसला लिया कि आज से अख़बार बंद।

आजकल पुराने अख़बारों में मसरूफ रहा करते हैं। रद्दी से पुराने ज्ञान को चमका रहे हैं और रद्दी के भाग्य पर अफसोस जता रहे हैं। उदारवाद के दौर में भी रद्दी का उद्धार नहीं हुआ। 1952 से रद्दी के दामों की बढ़ोतरी इतनी कमजोर है कि गणित भी फीसद निकालने में फेल हैं। यह अन्याय है। रद्दी भी उसी खुले बाज़ार में बेची जाती है जिसमें मसाले, दाल, चावल, आटा और सब्ज़ियां। इन सबके दाम चांद तक पहुंच गए लेकिन रद्दी के दामों का ग्राफ नहीं चढ़ा। आम गरीब आदमी की रोटी का जुगाड़ कही जाने वाली दाल सेंचुरी ठोकने को बेताब है, लेकिन मुई रद्दी अभी 6 रुपये का आंकड़ा तक पार नहीं कर पाई। रद्दी तुम तो ‘एलीट’ हो। तुम बंगलों के डायनिंग टेबल पर सजने वाले उस अख़बार का उत्पाद हो जो ‘अंबानियों’ से लेकर ‘मनमोहनों’ के हाथों से गुज़रती है। गरीब की थाली की दाल की तरह तुम्हारा सम्मान भी इस बाज़ार में होना ही चाहिए।

सरकार को रद्दी उद्धार के बारे में उसी तरह गंभीर विचार करना चाहिए जिस तरह महंगाई पर किया जा रहा है। वित्त मंत्रालय में आम बजट का कोहराम मचा है। तो हे हरि मुरारे, प्रभो हमारे बजट में ऐसा कोई जुगाड़ सेट करो जिससे एलीट रद्दी की हालत दाल से बेहतर हो सके। जिस तरह खाने पीने और धुआं निकालने की चीज़ों के दाम सालाना बढ़ जाते हैं, उसी तरह रद्दी भी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करे। दाल खाने वाले को अमीर होने का अहसास कराती महंगाई एलीट रद्दी की भी बलईयां ले। रद्दी भी सेंचुरी मार रही दाल के आंकड़े तोड़कर पांच सौ का आंकड़ा छू सके। हे बजट विधाता अख़बार पढ़ने वालों पर भले ही टैक्स लगाओ लेकिन रद्दी के दाम दाल से ऊंचे उठाओ। यही हमारे अख़बार पढ़ने का एकमात्र सहारा बची है।

Tuesday, January 19, 2010

कर्मण्ये वा ‘धिक्कार’ अस्ते !

हे कर्म करने वालों तुम पर धिक्कार है। जीवन को कर्म में गारद कर देते हो। तुम खुद को कर्मशील समझते हो। दुनिया तुमको कर्मकीट समझती है। तुम्हारा काम ही कर्म करना है। इसीलिए तुम दुनिया की निगाह में कीड़ा हो। गीता के उपदेशों को ज़माने ने जीवन में नहीं ढाला, लेकिन श्लोकों को अपने जीवन के हिसाब से ढाल लिया है। कर्म का मर्म समझो।

समाज कर्म की बेड़ियां तोड़ रहा है। लोगों पर रहस्य खुल रहा है कि कर्म का उपक्रम ही सही कर्म है। अब कर्म में यकीन करने वालों को ही मरना खटना पड़ता है। उपक्रम का सार जिसने गह लिया उसने ‘कर्मकांडों’ से मुक्ति पा ली। नए दौर में नई चाल ही मुफ़ीद होती है। जिसने दौर का मर्म समझ लिया समझो कठिन कर्म सागर का कठोर सफर पार कर लिया।

लंपट युग है। वाणी से कर्म का दिखावा ही युगवाणी है। तुम वो गधे हो जो कर्म से लद-लद कर मर जाओगे। ज़माना जानता है कि तुम काम करते हो। तुम कर्मशील हो इसलिए तुम्हें और काम थमा दिया जाता है। चलते घोड़े की पीठ पर चाबुक मारना ही उपक्रम है। उपक्रम वाले नित्यकर्म को भी कर्म से बचने के सूत्र की तरह इस्तेमाल करते हैं। कर्म से बचने के लिए इन्हें दिन में चार बार नित्यकर्म का बहाना करते देखा जा सकता है। कर्म जनता है और उपक्रम सरकार। जनता काम करे, सरकार का खज़ाना भरे।

कभी दफ्तर में अपनी पड़ोस वाली कुर्सी पर गौर करना। तुम्हारे कर्म की मलाई उपक्रम वाले खाते हैं। कर्म स्वास्थ्य को घुन की तरह खा जाता है। धन की उम्मीद तो कर्म से कभी न रखो। कर्म का दिखावा ही धनी बनाता है। कर्म तो रोटी का भी जुगाड़ नहीं कर पाता है। बाज़ार को देखो। लोकतंत्र के पहरेदार को देखो। शांतिवीर बराक ओबामा को देखो। क्रूज मिसाइल और ड्रोन से शांति फैलाकर शांति नोबेल झटक लाए। सब दिखावे से परम गति को प्राप्त हो रहे हैं। हे निर्बुद्ध इस सार को समझो। गधों की तरह खुर घिस-घिसकर जीवन को व्यर्थ न करो।

हे लंपट युग के साधारण प्राणी ! कर्म का दिखावा ही सफलता का सार है। खुले बाज़ार की उपक्रमव्यवस्था में अपने दिखावे को बेचना सीखो। दिखावा ही धनेश्वर, भोगेश्वर में लीन हो जाने एकमात्र मार्ग है। दिखावा से ही ये तुच्छ संसार तुम्हारे चरणों में दंडवत पेलेगा। तो हे लंपट युग के कर्मशील गधों नश्वर नाम को अमर करना है तो दिखावे के मार्ग पर चलो। तभी भौतिक जगत की सद्गति को प्राप्त हो सकोगे। इति श्री उपक्रमायः कथा।

Monday, January 11, 2010

मैं चटक गया हूं, बस ठसक ना लगे

उंगलियां ग्लेशियर में पड़ी हैं। लगता है रज़ाई में किसी ने बर्फ की सिलें रख दी हैं। रात करवटों और ख्यालों में कट जाती है। कभी सर्दी का शुक्रिया अदा करने का मन करता है। कभी बैरन सिहरन को ठंडे होठों से गाली देने का मन करता है। गीली रात बंद रोशनदान में रास्ता तलाशकर सर्द हवा बिस्तर में धकेल देती है। सर्दी का मुकाबला करने के लिए दिमाग, ताज़ा और पुरानी यादों के जाले से ढके दरीचे के बाहर झांकने लगता है। जब नींद नहीं आती तो दिन भर की हरारत याद आती है। लगता है दफ्तर का सारा बोझ आज मेरे ही कंधों पर था। खटपट, राजनीति, सब बेकार हैं। दिमाग परेशान हो जाता है और धीरे धीरे ख्याल सपने बनकर दिल तक खिसक आते हैं। मन सात्विक हो जाता है। दिल चुपके से बच्चे सा मासूम बन जाता है।

फिर कोई ऐसा याद आता है जो कभी ज़हन से दूर नहीं होता। पनपते अहसासों को उसके पास भेज देने का मन करता है। मन करता है कि अपनी हर बात उस तक पहुंचा दी जाए। कह दूं कि हर बात तुम्हारे बिना अधूरी है। तुम्हारी बिना वाह के मेरी तारीफ, तुम्हारी बिना आह के मेरा दर्द और तुम्हारी बिना चाह के मेरा प्यार अधूरा है। मोबाइल हाथ में आता है और सर्दी से टक्कर लेती हुई उंगलियां उसके नाम डिजिटल खत टाइप करने लगती हैं। फिर बेदिमाग दिल खुद से सवाल करता है, कब का ‘एसएमएस अफसाना’ खत्म हो गया, इतनी रात गए ये सिलसिला दोबारा छेड़ना ठीक है? फिर खुद ही उड़कर सवाल लपककर जवाब देता है ‘नहीं’, उंगलियों को फिर अचानक ग्लेश्यिर में पड़े होने का अहसास होने लगता है, और फिर वापस लौट जाती हैं ठंडी रज़ाई में गर्मी तलाशने के लिए। उसकी याद में आंखें खारी हो जाती हैं और कुछ बूंदे पलकों से बाहर टपकने की लड़ाई लड़ती हैं।

बदन रज़ाई के गुनगुने हिस्से में सिमटा पड़ा है और दिल करवट लेता है। आराम तकिए के नीचे से नॉस्टेलजिया बाहर आने लगता है। दिमाग में स्टोर पड़ी बातें फिर आंखों के सामने तैरने लगती हैं। सर्दी मां के पास ले जाती है। याद आता है कि सर्दी ने तब कभी इतना नहीं सताया जब मां के पास सोता था। वो मेरी हथेलियों को अपनी बगलों में दबाकर गर्म कर देती थी। उसकी छाती से निकलती गर्मी मेरी सांसों में घुल जाती थी। फिर वो जकड़न याद आती है, जो पिताजी से मिलती थी। बार-बार रज़ाई करीने से ओढ़ाते थे। दोनों के बीच सोते हुए मेरी नन्हीं हथेली फर्क कर लेती थी। पिताजी की मूछों से बेहतर मुझे मां का आंचल लगता और करवट लेकर फिर वहीं सिकुड़ जाता था। फिर सोचता हूं बहुत दिन हुए मां से चिपटकर नहीं सोया इस बार घर जाऊंगा तो ज़रूर सोऊंगा। हर बार सोचता हूं कि पिताजी से एक बार गले मिलकर सारी तक़लीफें कह दूं, लेकिन हाथ उनके पैरों की तरफ गिरने लगते हैं। कभी चाहकर भी गले से नहीं लग सका। शायद इस बार...।

दिल अब भी परेशान करता है। कसक नहीं भूलता। मैं भी इंसान हूं, मशीन नहीं। अहसास मेरे पास भी हैं, फिर मैं छुपाता क्यों हूं। क्यों ख़ुद को दुनिया की निगाहों में मजबूत दिखाने की कोशिश करता हूं, जबकि हक़ीक़त ये है कि मैं टूट चुका हूं। कुछ सपने बुनते हुए, कुछ अपने चुनते हुए। कुछ ठोकरों से तो किसी के ठुकरा दिए जाने से। दिल ये मान क्यों नहीं लेता कि मैं चटक गया हूं उस कगार तक जहां एक ठसक लगे और मैं खनखना कर बिखर पड़ूं। रोना चाहता हूं लेकिन समझदारी या मर्द होने का अहसास तपिश बनकर आंसुओं को सुखा देता है, लेकिन सच है कि मैं बहुत दिन से फूट-फूटकर रोना चाहता हूं। खुशी तो चाहकर भी हाथ नहीं आई, अब लगता है तन्हाई में रोना भी मेरी कुव्वत से बाहर ही है। मैं रोना चाहता हूं, तरोताज़ा होना चाहता हूं। अलार्म बज गया है। रज़ाई ठंडी है। उफ्फ ये सर्दी क्या हड्डियां गलाकर दम लेगी। बंद रोशनदान से रोशनी छिटककर छत पर चमकती लकीरें उकेर रही है। अब ऑफिस शुरू। ज़रा ठहरो ए सुबह, फिर मुखौटा पहन लूं, उन्हें अहसास ना हो कि हालात ने मुझे कितना तोड़ दिया है।

Sunday, January 10, 2010

विकास का पैराडाइम ग्लोबल वॉर्मिंग

शाम की गीली सर्दी में चौक पर दम फूंक हो रही थी कि चित्तरकार हाथ में अंडों की थैली लटकाए खरामा खरामा चप्पल घिसते चले आए। देखते ही पान सने लाल दांत दिखाए और दोस्ती का वज़न मेरे कंधों पर डाल दिया। गले मिल लेने के बाद बोले कहां हो पत्तरकार नज़र नहीं आते। मैंने बस मुस्कुरा भर दिया। बोले क्या बात सर्दी में गर्मी का अहसास, शाम होते ही जमा लिया या फिर मनमोहन सिंह की तरह मुस्कान की चादर ओढ़ना सीख गए। भई सवाल पूछा है तो जवाब तो दो। मैंने कहा चित्तरकार आजकल दफ्तर से फुरसत नहीं मिलती। मुंह बिचकाकर शिगूफा मारा, दफ्तर में कौन शकरकंद उबाल रहे हो।


खैनी को रिटायरमेंट देते हुए चित्तकार बोले कि मनमोहन सिंह से याद आया कि हाल ही में तिरुवनंतपुरम में फिर कोपेनहेगन पर कुछ कह रहे थे हमारे पिरधानमंत्री। पता नहीं क्यों कोपेनहेगन की पूंछ पकड़कर झूल रही है सारी दुनिया ? तुम तो तमाम चिल्ल पों मचाते हो बताओ जरा कुछ।

गेंद मेरे पाले में थी, बोलने की बीमारी, झट से माइक लपक लिया और लगा सुनाने...198 देश, 15 हजार नेता, सुलगती धरती, कार्बन एमिशन का झगड़ा, अमीर और गरीब मुल्कों के मतभेद, बात पूरी नहीं हुई थी कि पोडियम पर फिर चित्तरकार चढ़ गए। बोले, भाईसाब, नतीजा क्या निकला? मैं बोला कुछ नहीं, तो फिर क्यों हाय तौबा मचाए हो।

चर्चाएं हो रही हैं और नतीजों में चर्चाएं निकल रही हैं। धरती ठंडी करने निकले थे सारे नेता और खुद हवाईजहाज और लीमोज़ीन से हवा गर्म करते हुए कोपेनहेगन चर्चा करने पहुंचे थे। इसी बीच चित्तरकार ने पान का ऑर्डर दे मारा और फिर वापस मुद्दे पर लौट आए।

भाईसाब नेता चर्चा से धरती ठंडी कर रहे हैं। धरती ठंडी करनी है तो चर्चा तो करनी पड़ेगी। चर्चा नेताओं का मौलिक अधिकार है। धरती ठंडी करने के लिए मिजाज के माकूल और ठंडे मौसम में ही बेहतरीन चर्चा हो सकती है। इसलिए विदेश में चर्चा सम्मेलन सभागार का चुनाव भी मौलिक अधिकार है।

चर्चा सभी संकटों का हल है। चर्चा के नतीजों में नेताओं के बीच कितने भी मतभेद हों लेकिन एक मुद्दे पर सारे मतभेद खत्म हो जाते हैं, बाकी चर्चा अगले सम्मेलन में की जाएगी। चर्चा वो महाकाव्य है जिसमें नेता भांय-भांय कर लौट आते हैं, और चर्चा से निकलने वाला अगली चर्चा का रास्ता ही चर्चा का नतीजा होता है। चर्चा से ही सभी कर्तव्यों की पूर्ति होती है। चर्चा से ही धरती ठंडी हो सकती है।

मैं बोला चित्तरकार मामला गंभीर है ऐसी बातें ना करो, लेकिन उन्होंने ग्लोबल लीडर्स को रास्ते में पड़ी कुतिया की तरह लतियाना जारी रखा। मनमोहन सिंह वहां तो पैसे की आड़ लेकर जिम्मेदारियों से मुंह फेरते रहे और यहां शेख हसीना को मिलयनों डॉलर बांट रहे हैं। ये तो वही बात हुई कि घर में ना दाने, और सरकार चले लुटाने। मैं बोला चित्तरकार कहावत तो यूं है...तो बोले चुप करो बे। तुम पत्तरकार हो और दूसरों की कहवतों पर जीते हो। कुछ तो किरयेटिव कर लिया करो।

इतना कहकर चित्तरकार ने मुंह में पान की बहाली कर दी। होठों के कोरों की पीक अंदर खींचते हुए बोले। ये नेताओं के चोचले हैं। नेता और अफसर अमले की विदेश यात्रा और मिजाज़ दुरुस्त रखने के लिए ऐसे सम्मेलन विदेश में रखे जाते हैं। यूं तो नेता जात और कल्याण शब्द का केवल बस और सवारी वाल संबंध है। सत्ता की मंज़िल पर पहुंचकर इस शब्द को ये ऐसे ही छोड़ देते हैं जैसे सवारी बस को। लेकिन अब कल्याण का ठेका खुद प्रकृति ने ले लिया है तो दुनिया के पेट में मरोड़ हो रही है।

गर्मी से ही मानव कल्याण, समता मूलक समाज, रंगभेद और जीवन शैली की ऊंच नीच खत्म होने वाली है। इसीलिए धरती गर्म हो रही है। नेताओं ने कल्याण के लिए बस आंकड़े जुटाने वाली कुछ संस्थाएं बनाई हैं। यूएनडीपी, डब्ल्यूएचओ, वर्ल्ड इकनोमिक फोरम जैसी संस्थाएं अमीरी गरीबी के आंकड़े जुटकार गरीब देशों की बेइज्ज़ती करती रहती हैं। मैं बोला ऐसा नहीं है चित्तरकार ज़रा सुनो। अरे तुम क्या सुनाओगे।

इतने में सामने से बुल्ला गुजरा और चित्तरकार ने हुंकार के साथ उसे बैठने का बुलावा दिया। बुल्ला लपककर बेंच पर ऐसे बैठ गया जैसे उसे राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिल गई हो। चूना चाटकर पान की पोटेंसी बढ़ाते हुए चित्तरकार फिर मुद्दे पर लौट आए। नेताओं को लगता है कि बेइज्ज़ती से ही विकास हो सकता है, लेकिन इनके विकास के ‘अपमान पैराडाइम’ का तोड़ अब कुदरत ने ढूंढ निकाला है।

बैरी सर्दी न जाने कितनों की मौत का फरमान लाती है। बूढ़े रज़ाई में टें बोल जाते हैं और गरीब फुटपाथों पर अकड़ जाते हैं। जाड़े की विदाई से अब ज़िंदगियां बचेंगी। गरीब देशों की जन्म मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा बढ़ी हुई दर्ज़ की जाएगी। गर्म कपड़ों में बर्बाद हो रहे पैसे की बचत होगी। फिर गरीब नागरिक भी बारहों मास लाइफ स्टाइल से जियेंगे। गर्मी से गोरे काले का भेद मिटेगा। दुनिया रंग बिरंगी से समतामूलक एक रंगी हो जाएगी

... तो नेताओं से अपील है कि सभी तर्कवीर और बहस बहादुर चर्चा पर चर्चा करते रहें बाकी विकास प्रकृति कर देगी, और तुम सुनो तुम्हारे लिए ये सारा पुराण अलापा है जाओ अपने चैनल में जाकर ऐसा ही पैकेज चलाओ या फिर मुझे लाइव बहस में उतारो। मैंने सोचा आपसे पहले तो पीकदान लाइव उतारना पड़ेगा। उसके बाद बोले आओ सूरज अस्त हो गया। रिजाई जेब में पड़ी है, किसी ठेले पर पकौड़े छनवाएं। मैं बोला तीन दिन पहले ही पी थी, आज नहीं, लेकिन चित्तरकार मेरी कोहनी में हाथ फंसाकर मुझे इस तरह घसीटने लगे जैसे कुत्ता कुतिया को घसीट ले जाता है। चर्चा समाप्त और बैठकी शुरू.. और चित्तरकार ने ढक्कन खोल दिया।

Monday, January 4, 2010

आत्मघाती लो फ्लोर

सुबह-सुबह सूखे नल से जूझकर रात के ठंडे पानी से नहाने का नाच नाचते हुए बस अड्डे पहुंचा हूं। ठंड पर जलवायु परिवर्तन का खासा असर है लेकिन जल निगम की मेहरबानी से मुझे कम सर्दी में ज़्यादा सर्दी का अहसास हो रहा है। कपड़ों के नीचे बदन के रोएं कथक कर रहे हैं। मेरे जैसे तमाम लोग नोएडा के नीचे ज़मीन ऊपर आसमान वाले असीम बस शेल्टर के नीचे खड़े दिल्ली की शान का इंतज़ार कर रहे हैं। सब सड़क के किनारे पर खड़े हैं और बगुले जैसी गर्दन शरीर के दायरे से बाहर निकालकर लगभग सड़क के बीच तक पहुंचा दी है। इंतज़ार का ये तरीका बस के इंतज़ार में ईज़ाद हुआ है।

ये लोग बस का उसी तरह इंतज़ार कर रहे हैं जैसे हर कोई अपनी माशूका के इंतज़ार में परेशान हो। एकाएक सबकी माशूका हरियाली बिखेरती, चमचमाती, दिल्ली की शान लो फ्लोर आकर थम जाती है। उसके चौड़े दरवाज़े की तरफ उसके आशिकों की भीड़ लपकती है। इंतज़ार में आधी हो चुकी इस भीड़ को जनसुविधा की खातिर बनाया गया इसका तमाम चौड़ा दरवाज़ा भी कम पड़ रहा है। सब बस पर ऐसे टूट पड़े हैं जैसे अंदर भंडारे का प्रसाद बंट रहा हो। लपक-लपककर बैठ रहे लोग इस बात का सबूत दे रहे हैं कि वे सुबह-सुबह योग के आसनों से चुस्ती बटोरकर निकले हैं। लपककर सीट पर टपकने का काम खत्म हो जाने के बाद भी बस खाली है। कुछ लोगों को ये देखकर अपनी जल्दबाजी और कुलांचों पर शर्म भरी हंसी हंसते देखा जाता है। मैं पीछे की तरफ बैठने जाता हूं लेकिन एक ख्याल से सिहर जाता हूं। इंजिन पीछे है और आग के शोले या धुएं के बगूले पीछे से ही उठेंगे। इसलिए कदम ठहर जाते हैं और मैं आगे की तरफ ही एक सीट से चिपक जाता हूं। मन में डर है कि बस लाख का महल है कभी भी धू-धू कर जल उठेगी। इसलिए दरवाज़े के निकटवर्ती सीट पर टिक गया हूं। इसके बाद आपातकालीन दरवाज़े की खोज शुरू कर दी है। पड़ोस वाली खिड़की का शीशा बजाकर देख लिया है। कांच है ज़रूरत पड़ने पर टूट जाएगा। अपनी टांगों की ताकत और शीशे की मजबूती का तुलनात्मक अध्ययन कर लिया है। उम्मीद है कि मरता क्या न करता वाले हालात में शीशा को चकनाचूर कर दूंगा। लो फ्लोर मुझे फिदायीन लग रही है।


अगले स्टैंड से हिंदुस्तान का छैला, आधा उजला आधा मैला की तर्ज़ पर एक छैला बांका मेरे पास वाले पोल को अपनी कमर के बीच फंसाकर खड़ा हो जाता है। उसकी कमर का वज़न पाइप और मेरे कंधे पर बराबर पड़ रहा है। मैं गुज़ारिश करता हूं कि वो सीधा खड़ा हो जाए। लेकिन वो उसी तरह डटा खड़ा है जैसे पचास साल से फायरिंग के बीच ‘सीमा’ डटी खड़ी है। उसपर मेरी गुज़ारिश का उतना भी असर नहीं पड़ता जितना अफ्रीका में फेयर एंड लवली क्रीम के विज्ञापन का। बस बेआवाज़ सरपट चल रही है। अचानक ड्राइवर ब्रेक पर खड़ा हो जाता है। दिल में धुकर पुकर होने लगती है। पता लगता है कि ड्राइवर ने एक ज़िदगी से ऊब चुके मोटरसाइकिल सवार की आत्महत्या का प्रयास विफल कर दिया है। ड्राइवर अलग अलग तरह के सायरन बजाकर अपनी प्रयोगधर्मिता से सवारियों के कान फोड़ रहा है। कंडक्टर और ड्राइवर में बस की स्विच प्रणाली पर ज़िरह हो रही है।

आगे चलकर रबड़ के जलने की चिड़ांध नाक में बिना इजाज़त घुस आती है। सबके चेहरे पीले हो गए हैं। सब दाएं बाएं देख रहे हैं लेकिन किसी दिशा से धुंआ उठता नहीं दिखता है। ये राज़ भी खुलता है। सड़क के किनारे पर कोई फुटपाथिया पर्यावरण और देह को गर्म करने के लिए प्लास्टिक या टायर फूंक रहा है। अब बस एक ‘आग संभावित क्षेत्र’ से गुज़र रही है। मैं दुआ कर रहा हूं कि ये जगह किसी तरह पार हो जाए। वहां पहले भी दिल्ली की शान दो बार आग की चपेट में आ चुकी है। मैं आग लगने की संभावना से बचाव के उपाय तलाश रहा हूं। एक मात्र सिलेंडर नज़र आता है। मन कहता है कि कुछ नहीं होने वाला। यहां फायर ब्रिगेड स्टेशन ही लगाने की जरूरत है।

सफर में लो फ्लोर का मज़ा लेने से ज्यादा दिल आग के खतरे से दो चार हो रहा है। ब्लड प्रेशर नॉर्मल से हाई हो चला है। इससे भली तो वो ब्लू लाइन ही थी जो नोएडा से डायनासोर की तरह विलुप्त कर दी गई। कंडक्टर भले ही सवारी को जूतियाए या गरियाए लेकिन जान तो सलामत थी। वो चलती फिरती ऐसी बंकरबंद मिसाइल थी जो सवार को नहीं बल्कि सामने वाले को नष्ट करती थी। उसका जनता में खौफ था, इसका सवार के मन में खौफ है। ये फिदायीन पता नहीं कब फट पड़े और अपने साथ हमें भी ले बैठे। इसी सोच के साथ किसी तरह सफर खत्म होता है। कंडक्टर उतरते हुए मेरी तरफ देखकर मुस्करा देता है और मैं जान की सलामती और मंज़िल पर पहुंचने की खुशी से झूम उठता हूं।

Monday, December 14, 2009

कचरा क्रांति !

कलिकाल में एक राजा था। हर राजा की तरह उसे भी यही ग़ुमान था कि उसे भगवान ने शासन करने के लिए पैदा किया है। लुई सत्रहवां नाम का वो राजा फ्रांस नाम के राज्य का शासन चलाता था। उसके नाम से ही उसकी पीढ़ियों की शिक्षा और शब्दकोश ज्ञान के बारे पता लग जाता है। सत्रह पीढ़ियों में उसके यहां पैदावार बढ़ी थी, शिक्षा नहीं। सत्रह पीढ़ियों का नाम लुई ही रहा बस अंकगणित का खेल चालू रहा। अट्ठारहवीं शताब्दी के बुढ़ापे में जब सत्रह नंबर का लुई भी बुढा़ रहा था तो अचानक एक बवंडर उठा। जो जनता उसके सामने सिर झुकाए और सलाम बजाए रहती थी उसी ने 1793 में उसकी ऐसी गर्दन नापी कि उसे खुद इसका यकीन नहीं हुआ।

दिन बीते बरस बीते, काल कलि ही रहा लेकिन शासन करने की ज़ारशाही और राजशाही जैसी पद्धतियां बदलने लगीं। नेपाल और भूटान जैसे देशों ने जनता का उल्लू काटने के लिए जनतंत्र लागू कर दिया, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में एक शहर में एक सेक्टर के एक छोटे से कोने में जारशाही, नाज़ीवादी शासन के अवशेष कुछ दिमागों के कोनों में सड़ते रह गए। यहां एक राजा और राजकुमारी ने एक 200 गज के प्लाट में अपना ‘ग्लोब’ बसा लिया। ये इनका अपना आभासी जगत था। यहां इनका शासन चलता, इनकी प्रभुसत्ता। इस कोने में लोकतंत्र, संविधान, अधिकार, प्रदर्शन, योग्यता और ‘अभिव्यक्ति’ सब चुटकुला समझे जाते हैं। ज्ञान आधारित रोजगार की अर्थव्यवस्था में भी यहां नाज़ीवादी नियम ज़िंदा हैं। उन्नति के लिए ‘मेरिटोक्रेटिक सिस्टम’ नहीं केवल एक ही तंत्र काम करता है, राजकुमारी का वरदहस्त। इसी से सब सिद्ध हो सकता है। थोड़ा बहुत ‘जेंडरोक्रेटिक सिस्टम’ भी काम करता है। योग्यताएं इस प्लाट में पानी भरती हैं। शासन व्यवस्था ने अहलकार, सूबेदार, हवलदार और भी कई तरह के दार तैनात कर रखे हैं। गुप्तचर अमला इजराइल की खुफिया एजेंसी ‘मोसाद’ से भी उम्दा, जिसमें कई तरह के परजीवी (INSECTS) खूनखेंचू किलनी की तरह जनता का रक्तपान कर अपनी आजीविका कमा रहे हैं।

शासन के दीवाने ख़ास की रपटों के मुताबिक सब दुरुस्त चल रहा है। जनता मालपुए झाड़ रही है और राजा, राजकुमारी के गुण गाते धन-धान्य से पूर्ण, शासन का धन्यवाद कर रही है। योग्यता की जितनी परख इनके सूबेदारों और अलंबरदारों को है उसके मुताबिक सबको पर्याप्त दिया जा रहा है। ‘दारों’ की काग़ज़ी और गैरकाग़ज़ी रपटों ने शासन की आंख पर सुख-शांति का चश्मा बांध दिया था, लेकिन एक लावा कहीं धधक रहा था। जिस चमकदार राज्य पर शासक चमकते थे उसे चमकाने वाले अंदर अंदर ही अंदर लावा की तरह धधक रहे थे। अधिकारों को तरस रहे थे।
कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। लुई सत्रहवें की तरह इन्हें भी यही भ्रांति थी कि भगवान ने इन्हें शासन करने के लिए भेजा है। सलाम बजाने वाले अदब से झुके रहेंगे और क्रांति नहीं होगी, लेकिन हद दर्ज़े के शोषण ने धैर्य को डिगा दिया और इतिहास एक बार फिर दोहराया जाने लगा। अद्भुत क्रांति फूट पड़ी। लुई को सत्ता से उखाड़ फेंका गया था लेकिन यहां सत्ता पर बेइज्ज़ती का घातक वार किया गया। कहते हैं जूता मारक मिसाइल है। निशाने पर लगे तो भी बेइज्ज़ती, चूके तो भी मिशन कंप्लीट, लेकिन यहां जूते से भी घातक मिसाइल छोड़ी गई थी। कचरा मिसाइल। कचरा क्रांति ऐसी फूटी कि चकाचक चमकने वाले फ्लोर पर गाढ़ा कीचड़ सना कचरा पड़ा था, और असंतुष्टों ने एक कुत्ते का शव सप्रेम भेंट किया था। इनको डांटने, हड़काने वाले अलंबरदार अपने-अपने दरबार छोड़ भागे। सबके चेहरों पर डर और आशंकाएं तैर रही थीं। क्रांति ने शासन का कचरा कर दिया था। जनता की आवाज़ ख़ुदा का नक्कारा। जनता के आक्रोश के आगे सरकार को घुटने टेकने पड़ते हैं। बदनामी के हज़ार पैर होते हैं। फैल गई। इज्ज़त शासन की चारदीवारी में थी, रुसवाई दूर तक गई।

क्रांति अधिकारों के लिए होती है। इस क्रांति ने भी अधिकारों की लड़ाई जीत ली। शासन अब भी भ्रम में है। रुसवाई उन तक नहीं पहुंची। काले शीशों में कैद वो एश्वर्य के चटखारे मारते धन पशु की तरह मस्त हैं। रपटें दुरुस्त हैं। शासन फल फूल रहा है। जनता अब भी मालपुए झाड़ रही है। खेत को बाड़ खा रही है। अलंबरदारों की टुकड़ी मौज उड़ा रही है। यही है राजतंत्र का चेहरा जिसे बरबादी की भनक तक नहीं लगती।